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जैन धर्मावलंबियों ने भी घर पर मनाया, अक्षय तृतीया का पर्व!

दमोह : अक्षय तृतीया जैन धर्मावलम्बियों का महान धार्मिक पर्व है. इस दिन जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर श्री ऋषभदेव भगवान ने एक वर्ष की पूर्ण तपस्या करने के पश्चात इक्षु (शोरडी-गन्ने) रस से पारायण किया था. जैन धर्म के प्रथम तीर्थकर श्री आदिनाथ भगवान ने सत्य व अहिंसा का प्रचार करने एवं अपने कर्म बंधनों को तोड़ने के लिए संसार के भौतिक एवं पारिवारिक सुखों का त्याग कर जैन वैराग्य अंगीकार कर लिया. सत्य और अहिंसा के प्रचार करते-करते आदिनाथ प्रभु हस्तिनापुर गजपुर पधारे जहाँ इनके पौत्र सोमयश का शासन था. प्रभु का आगमन सुनकर सम्पूर्ण नगर दर्शनार्थ उमड़ पड़ा. सोम प्रभु के पुत्र राजकुमार श्रेयांस कुमार ने प्रभु को देखकर भगवान आदिनाथ को पहचान लिया और तत्काल शुद्ध आहार के रूप में प्रभु को गन्ने का रस दिया. जिससे भगवान आदिनाथ ने व्रत का पारायण किया. जैन धर्मावलंबियों का मानना है कि गन्ने के रस को इक्षुरस भी कहते हैं. इस कारण यह दिन इक्षु तृतीया एवं अक्षय तृतीया के नाम से विख्यात हो गया.

लॉक डाउन के कारण जैन धर्मावलंबियों ने इस महान पर्व को परम पूज्य मुनि श्री सुधासागर जी महाराज एवं परम पूज्य मुनि श्री प्रमाण सागर जी महाराज के निर्देशानुसार अपने घर पर ही भक्ति भाव के साथ मनाया. भक्तों ने टेलीविजन पर पूज्य मुनि श्री के सानिध्य में आयोजित हुए कार्यक्रम को देखते हुए पूजन अर्चन किया. इस प्रकार कोरोना संक्रमण के काल में सोशल डिस्टेंस एवं लॉक डाउन का पालन करते हुए प्रशासन के निर्देशानुसार घर में ही रहकर पर्व मनाया.

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