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कुंडलपुर में पहली बार हुई मुनि दीक्षा, बन गया इतिहास, किसके नाम दर्ज हुआ जानिए!

दमोह : जिले का प्रसिद्ध जैन तीर्थ क्षेत्र कुंडलपुर में उस समय एक इतिहास रच दिया गया, जब एक जैन आचार्य ने यहां पर पहली बार जैन संत को मुनि दीक्षा दी. दरअसल यहां पर पूर्व के वर्षों में परम पूज्य आचार्य विद्यासागर जी महाराज के द्वारा आर्यका दीक्षा दी जा चुकी है. लेकिन पहली बार ऐसा मौका आया है, जब किसी आचार्य ने कुंडलपुर जैसी परम पावन भूमि पर मुनि दीक्षा दी है, और दीक्षा देने वाले भी परम पूज्य आचार्य विद्यासागर जी महाराज के शिष्य पूज्य आचार्य निर्भय सागर जी महाराज है. उन्होंने अपने ही संघ के जैन संत को मुनि दीक्षा देकर कुंडलपुर में इतिहास रच दिया.

वैज्ञानिक संत आचार्य श्री निर्भय सागर जी महाराज का कुण्डलपुर में सुबह आगमन हुआ. कुंडलपुर में आर्यिका ऋजु मती माताजी ससंघ, ऐलक श्री विनम्र सागर जी महाराज पहले से विराजमान थे. उन्होने आचार्य संघ की अगवानी की. आचार्य निर्भय सागर जी महाराज की अगवानी के पश्चात बडे़ बाबा का अभिषेक शांतिधारा, आचार्य श्री विघासागर जी महाराज की पूजन, आचार्य छत्तीसी विधान किया गया.

इसी दौरान आचार्य संघ में छुल्लक श्री विनम्र सागर जी ने आचार्य श्री को देखा और उनके दीक्षा लेने के भाव हुए. उन्होंने आचार्य श्री निर्भय सागर जी महाराज से मुनि दीक्षा लेने प्रार्थना की. आचार्य श्री ने उन्हें मुनि दीक्षा देने की स्वीकृति प्रदान की. जिसके बाद कुंडलपुर स्थित विद्या भवन में दोपहर 3 बजे से दीक्षा की क्रिया सम्पन्न की गई.

कुण्डलपुर के इतिहास में पहली बार मुनि दीक्षा दी गई. इसके पूर्व आचार्य श्री विद्या सागर जी महाराज ने तीन बार आर्यिका दीक्षा प्रदान की हैं. लाक डाऊन में यह पहली दीक्षा है. बिना प्रचार प्रसार के आचार्य संघ एवं आर्यिका संघ की उपस्थिति में यह मुनि दीक्षा एक इतिहास बन गयी. दीक्षा प्रदाता आचार्य श्री निर्भय सागर जी महाराज के कर कमलों से यह 11 वी दीक्षा थी.

दीक्षा ग्रहण करने वाले मुनि श्री गुरुदत्त सागर जी महाराज का पूर्व नाम संजय कुमार था. माता श्रीमति अंगुरी बाई, पिता नाथूराम जैन वरा तहसील बंडा जिला सागर निवासी थे. 12 वर्ष पूर्व 7 जुलाई 2008 को उन्होंने मुनि प्रबुद्ध सागर जी महाराज से क्षुल्लक दीक्षा ग्रहण की थी. आचार्य श्री ने मुनि दीक्षा के बाद गुरुदत्त सागर नाम रखा. इसका कारण बताते हुए आचार्य श्री ने कहा आज आचार्य गुरु जी महाराज का 53 वाँ मुनि दीक्षा दिवस की स्मृति में यह नाम दिया है.

आचार्य श्री ने कहा दिगम्बर अवस्था में धारण किये विना आत्मा कभी परमात्मा नहीं बनती और ना मोक्ष पद की प्राप्ति होती है. प्रत्येक इंसान दिगम्बर ही जन्म लेता है, और मरने के बाद कफन डालकर उसे हटाना दिगम्बर करने का प्रतीक है. इसके पूर्व मुनि शिवदत्त सागर जी महाराज, मुनि सुदत्त सागर जी महाराज, मुनि सोम दत्त सागर जी महाराज आर्यिका ऋजु मति माता जी, क्षुल्लक चन्द्र दत्त सागर जी महाराज ने आचार्य गुरुवर श्री विद्या सागर जी महाराज के दीक्षा दिवस के महोत्सव पर पावन प्रसंग सुनाये.

दीक्षार्थी के माता पिता वनने का सौभाग्य कुण्डलपुर तीर्थ क्षेत्र कमेटी के अध्यक्ष सिंघई संतोष कुमार जी श्रीमती सुशीला जैन को प्राप्त हुआ. पिच्छिका प्रदान करने का सौभाग्य ब्र अंकुर भैया छतरपुर, गोलू भैया, स्वतंत्र भैया, दिलीप भैया आदि ब्रहम्चारियों को एवं कमंडल प्रदान करने का सौभाग्य समस्त ब्रह्मचार्णी दीदीयों को प्राप्त हुआ. शास्त्र भेंट करने का सौभाग्य डाँ संतोष कुमार जी, राकेश सिंघई, ब्र. रेषू भैया एवं छतरपुर के स्वाध्याय मंडल के सदस्य आशीष विट्टू, विषू, कु. आयूषी, कु. रोशनी, कु. रेषू दीदी छतरपुर वालों को प्राप्त हुआ.

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