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आत्मा दुनिया की सबसे सुंदर वस्तु – आचार्य निर्भय सागर जी महाराज!

दमोह : मनुष्य को जीवन में क्या उपादेय है. जीव तत्व आत्मा को जानना उपादेय है. आत्मा जिसमें सुख का संवेदन है, जिसमें जानने देखने की शक्ति है. उसे ही मनुष्य जानता नहीं है. जबकि दुनिया के तमाम जड़ पदार्थों को वह जानने का प्रयास करता है. उनसे मोह करता है. किंतु वह शरीर तभी तक सुंदर है जब तक इसमें आत्मा रहती है. आत्मा के निकलते ही इस शरीर में कीड़े बिल बिलाने लगते हैं. शरीर से आत्मा निकल जाए तो यह शरीर सबसे घिनौनी वस्तु बन जाती है. जिसे कोई छूता भी नहीं. इसीलिए आत्मा ही दुनिया की सबसे सुंदर वस्तु है. जिसे अंग्रेजी में सोल कहते हैं. सोल के पहले अक्षर एस का मतलब सेफ है. याने सुरक्षित अविनाशी. दूसरे अक्षर ओ से मतलब ओन्ली याने आत्मा के सिवा कुछ नहीं हमारा. आप अकेला आप तरे, मरे अकेला होय. तीसरा अक्षर यू अक्षर से मतलब यूज़फुल ज्ञान और दर्शन गुण हैं. आत्मा में अंतिम अक्षर ऐफ से तात्पर्य फियर याने सुंदर है. आत्मा को पहचानना ही सम्यक दर्शन है. सम्यक दर्शन ही मोक्ष महल की प्रथम सीढ़ी है. मोक्ष मार्ग पर बढ़ना है तो सम्यक दर्शन से अपनी आत्मा को पहचानना आवश्यक है.

उपरोक्त उद्गार आचार्य निर्भय सागर जी महाराज ने अपने मंगल प्रवचन मैं जबलपुर नाका मंदिर में अभिव्यक्त किए. इस अवसर पर दिगंबर जैन पंचायत के अध्यक्ष सुधीर सिंघई गिरीश अहिंसा, जेके जैन, सुधीर विद्यार्थी, चंद्र कुमार न्यू किरण, रूपचंद अरिहंत, सुनील वेजिटेरियन, अखिलेश पंडित जी, संजीव शाकाहारी, संदीप अंजलि, गरीब दास, विनय जैन, सौरभ आदि की उपस्थिति रही.

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