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जिन्‍दगी के संग, लडी थी कोरोना से जंग,

विश्‍व महिला दिवस 8 मार्च
कोरोना काल नगर की इन महिलाओं ने भी अविराम नगर में दी सेवाएं नगर की कर्मवीर महिलाएं

हटा संजय जैन: कहते हैं मजबूत इरादों पर उम्र की दीमक नहीं लगती। अगर ठान लें तो कुछ भी नामुमकिन नहीं है। नगर की कुछेक महिलाएं ऐसी ही शख्सियत हैं, जिन्होंने उम्र व कार्य की परवाह किए बगैर विपरीत परिस्‍िथतियों में जमाने से हटकर सोचा, नगर की इन महिलाओं ने कोरोना काल में न सिर्फ अपने परिवार, गली मुहल्‍ला को सुरक्षित करने की सोचा वरन पूरे नगर व जो सामने आया उसे भी सुरक्षित किया, लीक से हटकर अपनी पहचान बनाई।

मधुवाला बाल्मिकी


नगर पालिका में विगत 22 वर्षो से कार्यरत सफाई कर्मचारी मधुवाला को अपनी मां के निधन उपरांत 18 वर्ष की उम्र में ही अनुकम्‍पा नियुक्‍ती मिल गई थी, प्राथमिक शिक्षा के बाद ही पढाई छूट गई, शादी हुई चार पुत्री हुई, दाम्‍पत जीवन भी ज्‍यादा नहीं चला, पति का निधन हो गया, बेटियों को अच्‍छी शिक्षा दिलाई, तीन की शादी भी कर दी, 18 वर्ष तक सफाई कर्मचारी के उपरांत कुछ वर्ष पूर्व ही सफाई सुपर वाइजर बनाया गया। गत वर्ष जब कोरोना काल चल रहा था, लाकडाउन के कारण लोगों का घर से निकलना बंद था, नगर में भी कोरोना के मरीज मिलना प्रारंभ हो गये थे, ऐसी विषम परिस्थितियों में भी मधुवाला प्रातः 5 बजे अपनी डियूटी पर आ जाती और नगर की साफ सफाई के लिए स्‍टाफ कर्मचारियों को डियूटी पर तैनात करती, तेज धूप की तपन हो, मूसला धार वारिश हो रही है, या नगर का तापमान 5 डिग्री से भी नीचे पहुंच गया हो, ऐसे में भी अविराम मधुवाला ने सेवाएं दी। अस्‍पताल, कोविड सेन्‍टर, क्‍वारंटीन सेन्‍टर में स्‍टाफ के लोगों को भेजा, साथ ही अपने स्‍टाफ को इतना सुरक्षित किया कि एक भी कर्मचारी कोरोना से प्रभावित नहीं हुआ।

संगीता सालोमन


विगत 37 वर्षो से स्‍टाफ नर्स का कार्य देख रही संगीता सालोमन ने पहले पन्‍ना में सेवाएं दी। इसके उपरांत लगातार हटा में सेवाएं दे रही है। कार्य दिवस के दौरान करीब 5 हजार से अधिक डिलेवरी करा चुकी है। पहले महिला डाक्‍टर न होने के कारण यह चुनौती पूर्ण था, उस समय सीनियर स्‍टाफ नर्स समूह के साथ डिलेवरी कराई जाती थी, ज्‍यादा कार्यकाल बिना महिला डाक्‍टर में ही निकला, क्षेत्र के पिछडापन, जागरूकता के आभाव से कई अविकसित मृत शिशुओं का जन्‍म भी हुआ। गत वर्ष जब लाक डाउन हुआ तो उस दौरान भी प्रतिदिन 10 से अधिक डिलेवरी केस आते थे, उस समय डिलेवरी कराना एक कठिन कार्य था, बाहर से भी मजदूरों को आना हो रहा था, पंजीयन अस्‍पताल भवन में ही हो रहा था, ऐसे में सरकार के द्वारा जो दिशा निर्देश दिये गये उनका पूरी तरह से पालन कराते हुए डिलेवरी कराई, प्रसूता व शिशू को कोराना से कैस सुरक्षित रखना है। इसके संबंध में उनके परिजनों को भी शिक्षित करना पडा, कुछेक महिलाएं तो ऐसी भी आई जिनमें कोरोना की संभावना व्‍यक्‍त की जा रही थी, तो ऐसी परिस्‍िथति में भीषण गर्मी में पीपीई किट पहनाकर डिलेवरी कराई, कोरोना काल में हटा सिविल अस्‍पताल में जितनी भी डिलेवरी कराई गई वे सभी कोरोना से सुरक्षित रही। संगीता सालोमन ने बताया कि अस्‍पताल में डियूटी के दौरान कई बार मरीज के परिजन अपशब्‍दों का प्रयोग करते, व्‍यवस्‍थाओं को कोसना प्रारंभ कर देते है, ऐसी परिस्‍िथति में क्रोध की अग्नि को, सहन शीलता के साथ मधुर वाणी के शीतल जल से ही ठण्‍डा किया जाता है, यह बात हम सदैव अपने जूनियर स्‍टाफ को सिखाते है।

मुक्‍ता राजपूत


सामाजिक एवं कुशल गृहणी मुक्‍ता राजपूत जल संसाधन विभाग में पदस्‍थ उपयंत्री महेश कुमार राजपूत की धर्मपत्‍नी है, कोरोना काल में दोनों बेटी एवं एक पुत्र विदिशा, बैंगलौर, देहरादून में था, मुक्‍ता अपनी बेटी बेटा से सिर्फ मोबाईल पर बात करती रही, समाज सेवा में आगे आ गई, सरकार के द्वारा जब मास्‍क की अनिवार्यता की बाजार में मास्‍क भी नहीं मिल रहे थे, तो ऐसे में मुक्‍ता राजपूत ने स्‍वयं 3 हजार से अधिक मास्‍क बनाकर निःशुल्‍क लोगों में वितरित किये, पैदल निकल रहे राहगीर, अस्‍पताल आदि स्‍थानों पर मास्‍क का वितरण किया, बाजार बंद होने के कारण कपडा एवं लेस न मिलने पर घर पर रखे नये कपडों को भी काटकर मास्‍क बना दिये, यह कार्य गर्मी एवं बरसात में जारी रखा,
श्रीमती मुक्‍ता ने बताया कि कोरोना काल में देहरादून में बेटा की आर्मी में चयन होने पर पासिंग आउट परेड में न जाने का दुख हुआ। लेकिन जब घर के सामने से बेहाल मजदूर निकल रहे थे, तो उनकी सेवा करके ही मन का शांत किया, इसी सेवा को ही सबसे अच्‍छी सेवा मानी।

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