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दुसरो को दवाकर नहीं, दवा बनकर जीवन जियो – आर्यिका श्री!

संजय जैन /हटा दमोह : इंसान में अनेक संभावनाए रहती है, वह आत्‍मशक्ति से उनको पहचान सकता है, जब वह इंसानियत का जीवन जीना प्रारंभ करता है तो चांद सितारे भी पीछे रह जाते है, उसके विकास को देखकर देवता भी प्रसन्‍न होते है, लेकिन जब मनुष्‍य जब पाप का जीवन जीता है तो उसका जीवन नरक से भी नीचे चला जाता है, यह बात आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज की आज्ञानुवर्ती शिष्‍या आर्यिका श्री गुणमती माता जी ने श्री आदिनाथ त्र्मूर्ति दिगम्‍बर जैन मंदिर में रविवारीय मंगल प्रवचन में कही।

आर्यिका श्री ने कहा कि मानव जीवन में वह सीढि भी है जो हमें स्‍वर्ग मोक्ष मार्ग पर ले जाने उपर उठने के लिए प्रेरित करती है वही सीढी पतन के मार्ग तक भी जाती है, इस सीढी का उपयोग मोक्ष मार्ग सिद्धालय की ओर जाना है या पतन की ओर इसका चयन अपने जीवन में करना होगा।

आर्यिका श्री ने कहा कि मनुष्‍य का जीवन उस कोरे कागज की तरह होता है, जिस पर आप जो लिखेगे उसी को पढेगे, उस कागज पर गीत लिखना है या गाली यह स्‍वयं तय करना होगा क्‍योकि वर्णमाला व कलम सदैव निष्‍पक्ष होती है, यदि अपने जीवन के कोरे कागज पर गीत लिखोगें तो जीवन तीर्थ बन जायेगा, वही जब उस कागज पर गाली लिखोगें तो जीवन तमाशा बनकर रह जायेगा, तुम्‍हारे अंदर वो रहस्‍य छिपे है, वह सारी शक्ति है जो परमात्‍मा को प्राप्‍त है, इंसानियत का मंदिर सबसे बडा मंदिर माना जाता है, दूसरो को गिराकर नहीं बल्कि उठाकर जीवन जियो, दुसरो को झुकाकर नहीं खुद झुक कर जीने की आदत डालो, दुसरों को दवा कर नहीं बल्कि दुसरों के लिए दवा औषधि बनकर काम आओ।

आर्यिका श्री ने कहा कि अपने घर आंगन एक ऐसा पौधा रोपें जिसकी छांव व उसके पुष्‍प की सुगन्‍ध पडौसी के घर तक पहुंचे, घर की दीवाल इतनी अधिक मत उठा देना कि बाहर से निकलने वाला इंसान ही दिखाई न दे, अपने सगे संबंधी भी दूर होते जाये, इंसायित का जीवन ही देवत्‍व तुल्‍य होता है।


माना कि मंदिर में ज्ञान नहीं मिलता,
पत्‍थर को पूजने से भगवान नहीं मिलता,
फिर भी मजबूर होकर लोग पत्‍थर को पूजते है,
क्‍योकि उन्‍हे पूजने योग्‍य कोई इंसान नहीं मिलता।


जो दुसरो के दुख को देखकर उसके दुख को दूर करने की जगह हंसता है, वह इंसान के रूप में पशु होता है, दुसरो के दुख को अपना सुख व सब कुछ छोडकर मदद करता है, वही इंसानियत का जीवन होता है, आप सभी समर्थ है, दूसरों की मदद करने में सक्षम है, अपने अंदर से मदद का जज्‍बा होना जरूरी है, क्‍योकि किसी की आज जो छोटी सी मदद होती है, वह मदद कब किस रूप में आपको किस उंचाई तक पहुंचा दे इसका आकंलन भी नहीं किया जा सकता है।


मंदिर जी में हुए मंगल प्रवचन के पूर्व शिक्षिका कीर्ति द्वारा मंगलाचरण प्रस्‍तुत किया गया एवं बहिन निशा जैन ने मंगल गीत प्रस्‍तुत किया, सिरोंज से भक्‍तों एवं शिखर चंद पटवारी, प्रकाश बाकल, राकेश अध्‍यक्ष, सोनू पंडित के द्वारा बडे बाबा एवं आचार्य श्री के चित्र का अनावरण किया। महिला मंडल के सदस्‍यों द्वारा ज्ञान ज्‍योति दीप प्रज्‍जवलित किया। कार्यक्रम का संचालन जयकुमार जलज द्वारा किया गया।

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