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वृद्धजन दिवस – आज बज रहे तबला और बाजे, उस समय कहां थे जब बुजुर्ग कर रहे थे फांके!

संपादकीय

तूफान की बात…….. वृद्धजन दिवस के अवसर पर दमोह के एकमात्र वृद्ध आश्रम में हारमोनियम तबला संगीत की धुन और बुजुर्गों का सम्मान तो किया जा रहा है, अच्छी बात है। लेकिन उस समय यह संगीत, उस समय यह तारीफ और उस समय यह लोग कहां थे ? जब बुजुर्गों को सुबह से ना नाश्ता मिला था ना चाय और ना ही भोजन। कुल मिलाकर बुजुर्गों को उस दिन फाके करना पड़ा था। ऐसे हालात में जब आवश्यकता थी उस समय कोई क्यों सामने नहीं आया। जो लोग मीडिया को कोसते हैं वही मीडिया इन बुजुर्गों की पीड़ा को सामने लाने के लिए आगे आया और मीडिया की खबरों के आते ही प्रशासन में हड़कंप के हालात निर्मित होते ही यहां की व्यवस्थाओं को एक बार फिर दुरुस्त करने की कवायद की गई। लेकिन सवाल यह है कि जिस व्यवस्था को प्रशासन के द्वारा दुरुस्त किया जाना चाहिए, वह व्यवस्था मीडिया के दिखाए जाने के बाद ठीक क्यों की जाती है और फिर 365 दिन में आने वाले वृद्धजन दिवस पर यह दिखावा क्यों ? वजह कुछ भी हो लेकिन इस पर विचार करना अनुकरणीय है। जहां वृद्ध आश्रम में स्थाई कर्मचारियों की उस वक्त कमी थी, आज सामाजिक न्याय विभाग के एक कर्मी को व्यवस्था हेतु नियुक्त किया गया है। लेकिन उस वक्त ही यदि सही कर्मचारी को यहां पर नियुक्त किया गया होता, तो इन बुजुर्गों के लिए एक दिन खाने के लिए परेशान ना होना पड़ता।

यूं तो सामाजिक न्याय विभाग बुजुर्गों पर खर्च करने के लिए बजट का रोना रोता है। लेकिन इस तरह के आयोजन करने के लिए हजारों रुपए पानी की तरह बहा दिए जाते हैं। तो यह पैसा कहां से आता है। यदि यही पैसा इन बुजुर्गों के दैनिक क्रियाओं के लिए प्रयोग किया जाए, तो निश्चित ही बुजुर्गों को कभी भी परेशानी ना उठाना पड़े। इस तरह का आयोजन सही मायनों में तभी ठीक कहा जाता, जब 364 दिन भी इन बुजुर्गों के लिए बिना परेशानी के निकलते और उसमें सहयोग सामाजिक न्याय विभाग का होता। लेकिन यह सवाल, सवाल ही रहेगा, क्योंकि जवाब देने वाला कोई नहीं है।

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