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मिट्टी की यह माता रानी की मूर्ति 170 साल पुरानी,1857 की क्रांति के पहले 1851 मे हुई थी मां की स्थापना!

दमोह : जिला मुख्यालय पर मां जगतजननी का एक ऐसा दरबार है, जहां पर माता रानी की मिटटी से बनी प्रतिमा 1857 की क्रांति के पहले दमोह के इस मंदिर में स्थापित है। 170 साल पुराने माता रानी के इस दरबार में यहां से मनोकामना को पूरी करने के लिए प्रदेश सहित यहां अन्य राज्यों से भी लोगां का आना जाना नवरात्र के समय लगता है। यह मंदिर कई मायनों में खास माना जाता है। एक ही पीढी के लोग माता रानी की सेवा में नवरात्र के दौरान दिन रात जुटे रहते है।

170 साल पुरानी प्रतिमा है-

भारत माता दुर्गा देवालय के नाम से जाना जाने वाला यह दरबार जिला मुख्यालय के फुटेरा वार्ड में स्थित है। मंदिर की स्थापना सन 1851 में पंडित हरप्रसाद भारत ने की थी। वर्तमान में मंदिर में उनकी ही पीढी के पुजारी पंडित नरेंद्र भारत गुरूजी है। मातारानी की यह प्रतिमा विशुद्ध रूप से मिटटी से बनी हुई है। जिले की यह पहली दस भुजाधारी प्रतिमा है। जो शूल से राक्षस का संहार करती नजर आती है। वहीं इस प्रतिमा के दाएं एवं बाएं माता रानी की गणिकाएं भी विराजमान है। इस प्रतिमा का निर्माण जिले के ही हटा में किया गया था। उस समय माता रानी की इस प्रतिमा को दमोह बैलगाडी से लाया गया था।

6 माह में एक बार खुलता है माता का दरबार-

माता रानी का यह दरबार साल में दो बार खुलता है। यानि चैत्र एवं क्वार के नवरात्र में ही इस दरबार के दर्शन हो पाते है। सिंहवाहिनी माता के इस दरबार में दोनों ही नवरात्र के दौरान भक्तों का आना जाना लगा रहता है। साल में दो ही बार खुलने के कारण विशेष पूजा अर्चना के साथ ही माता रानी का दर्शन कर आनंदित होने वाली की कतारे भी लगती है। नवरात्र के एक दिन पहले तथा एक बाद तक दरबार में पूजा होती है। वहीं इसके बाद मूर्ति को ढंककर बंद कर दिया जाता है। यह परंपरा लगातार जारी है। यहां के पुजारी पंडित नरेंद्र भारत गुरू जी ने बताया कि उनके पूर्वजों के माता रानी की सामने जो संकल्प लिया था। उसके अनुसार केवल साल में नवरात्र को ही यह मंदिर खुलता है।

चमत्कारी है मां की मूर्ति-

बात ब्रिटिश काल की है। जब 1851 में माता की प्रतिमा की स्थापना की गई तो मां की प्रतिमा को दशहरे के अवसर पर शहर में भ्रमण के लिए निकाला जाता था। लेकिन साल 1944 में दमोह के द्वारका प्रसाद श्रीवास्तव ने गौ हत्या का विरोध करके आंदोलन चलाया था। तो उसी कारण से दशहरा चल समारोह के बीच में अंगेजों ने जुलूस पर रोक लगा दी। जिसके बाद करीब 22 दिन तक मातारानी की यह प्रतिमा पुराना थाना में रखी रही थी। वहीं प्रतिमा का लगातार पूजन किया जाता रहा। इसी दौरान पुजारी ने मां से प्रार्थना की। पुजारी ने कहा कि मां अब यह प्रतिबंध हटवा दो अब कभी भी आपकी प्रतिमा को मंदिर से बाहर नहीं निकाला जाएगा। तब ही ब्रिटिश अफसरों ने रोके गए जुलूस को आगे बढने का फरमान सुना दिया। मां के चमत्कार के बाद माता की इस प्रतिमा को तब से ही मंदिर में स्थापित कर दिया गया। तब से आज तक यह प्रतिमा यहीं पर विराजमान है।

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