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लिखने मजबूर हुआ बेबाक

लिखना बन्द कर चुके थे, हम वजह थी उसकी क्योकि हमारे लिखने से हमारे आपस के सम्बंध खत्म होने के कगार पर आ चुके थे. बचपन के दोस्त दूरियां बनाने लगे थे. हमारी बात उनको खटकने लगी थी. विचार अब मिलते नही थे, क्योकि उनको एक व्यक्ति विशेष में पूरा देश दिखता था. वो उसे भगवान मानने लगे थे. उन्हें उनका धर्म खतरे में दिख रहा था, और हमे देश खतरे में दिख रहा था. वो पाकिस्तान में 150 रुपये किलो टमाटर के भाव सुनकर प्रसन्न होते थे. पर मुझे मेरे देश मे बिक रही 200 रुपये किलो प्याज रुला रही थी.. इसलिए हमने भी देश दुनिया की चिंता छोड़ दी थी, क्योकि उन्हें रोहिंग्या दिख रहे थे, कश्मीर दिख रहे थे, पाकिस्तान दिख रहे थे, और मुझे मेरे आस पास का दिख रहा था. अपराधी सदन में जा रहे थे. निर्वाचित हो रहे थे. रुपया लुढ़क रहा था. नोकरी छिन रही थी. शिक्षा का बजट घट रहा था. पेट्रोल डीजल आसमान छू रहे थे. मेरे ये मुद्दे थे.. उनके मुद्दे हिन्दू, मुश्लिम, मन्दिर, मस्जिद, आरती, अज़ान, कश्मीर, बंग्लादेश, पाकिस्तान, जाति, धर्म मज़हब पर बात करना, डिबेट करना उनको पसंद था. इसलिए बैचारिक दूरियां बनते जा रही थी. दोस्त छिटक रहे थे. मनमुटाव बढ़ने लगा था. वजह थी हमारी बेबाक कलम….. इसलिए हमने दोस्त बचाना जरूरी समझा. सम्बंध बचाने जरूरी समझे. इसलिए लिखना ही बन्द कर दिया. न्यूज़ चैनल देखना बन्द कर दिया था… पर अभी हैदराबाद एनकाउंटर सुना तो पूरा वाक्या समझने के लिए अखवार पढ़ा तो लगा सारा देश खुशियां मना रहा था. एनकाउंटर को जस्टिफाई कर रहा था. पुलिस के इस कारनामे पर फूल बरसाए जा रहे थे. हमे लगा कि शायद जनभावनाओं के दबाब में कुछ गलत दिशा में तो नही जा रहे हम… इसलिए मन मसोसकर कल लिख ही दिया की “अपराधी को उसके अपराध की दृष्टि से देखिये. ये मत देखिये की वो किस धर्म जाती मज़हब का है. किस राजनैतिक दल का समर्थक है. गलत है, तो गलत है. गलत को गलत कहना ही होगा. इतना लिखा था मेरे बचपन के दोस्त फिर टूट पड़े. ये क्या लिख दिया तूने बेबाक. मुझे समझ मे नही आया कि हमने क्या गलत लिख दिया. बार बार पढ़ा पर समझ मे नही आया मुझे की मुझसे गलती कहाँ हो गई. फिर रात भर जागता रहा और समझने की कोशिश करता रहा. उन्ही दोस्तो की फेसबुक प्रोफाइल खंगालने लगा तो पता चला आजकल तो लोग मानवाधिकार वालो से नफरत करने लगे है. बौद्धिक वर्ग से भी नफरत कर रहे है. धर्मनिरपेक्ष लोगो को घृणा की दृष्टि से देख रहे है. ईमानदार और संविधान कानून की बात करने बाले लोगो को गालियां मिल रही है. मुझे लगा देश किसी गलत दिशा में जा रहा है. जब जनता ही अपराधियों को अपना प्रतिनिधि चुनकर संसद में भेजने लगी है, तो अपराधी सदन में बैठकर कैसा कानून बनाएंगे. इंसाफ अगर बदले की भावना में तब्दील होने लगेगा तो क्या होगा देश का… मन फिर विचलित हो गया. लोग अपराधी की जाति देखते है. उसका मजहब देखते है. वो किस राजनैतिक दल को बिलोंग करता है. पहले ये देखा जाने लगा है. फिर उसके पक्ष विपक्ष में खड़े होने लग जाता है. मुझे ये सब किसी बड़े अंदेशे की तरफ जाता हुआ वर्ग संघर्ष की दिशा में अग्रसर होता समाज दिख रहा है. जिसकी परिणीति बहुत वीभत्स रूप लेगी. इसलिए मुझे अरसे बाद लिखने को मजबूर होना पड़ा प्लीज सतर्क हो जाइए सजग रहिए खुद को बचा लीजिये.
….. आपका बेबाक

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One thought on “लिखने मजबूर हुआ बेबाक

  • December 9, 2019 at 3:26 pm
    Permalink

    थैंक्यू

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