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वर्षायोग मंगल कलश स्थापना एवं गुरु पूर्णिमा महोत्सव सानंद सम्पन्न!

गया : प.पू. राष्ट्रसंत वात्सल्य रत्नाकर, गणाचार्य, गुरुवर श्री 108 विरागसागर जी महाराज के परम प्रिय शिष्य आगम प्रवक्ता श्रमण मुनि श्री विशल्य सागर जी महाराज ससंघ का विरागानुभूति पावन वर्षायोग मंगल कलश स्थापना एवं गुरु पूर्णिमा महोत्सव धूमधाम से सोशल डिस्टेडिंग के साथ सम्पन्न हुआ.

चातुर्मास पर प्रकाश डालते हुए मुनि श्री ने कहा कि ज्ञान दर्शन चारित्र और, तप की आराधना का नाम है चातुर्मास, या स्व-पर कल्याण की प्रार्थना का नाम है चातुर्मास, आत्मा से परमात्मा का आयाम, जन जन धर्म और धर्मात्माओं से जोड़ने का योग एवं अतिशय पुण्य का भण्डार है चातुर्मास. साधना और आराधना का योग जिसमें होता है, वही वर्षायोग है. भारतीय संस्कृति में गुरु पूर्णिमा का विशेष महत्त्व है यह अध्यात्म जगत की सबसे बड़ी घटना के रुप में जाना जाता है, पश्चिमी देशों में गुरु का कोई महत्त्व नहीं है, लेकिन भारत में सदियों से गुरु का महत्त्व है. यहाँ की माटी एवं जन जीवन में गुरु को ईश्वर तुल्य या ईश्वर से बड़ा माना गया है, क्योंकि गुरु ही तो ईश्वर तक पहुंचने का मार्ग दिखाएगा. गुरु ही शिष्य का मार्ग दर्शन करते है, और वे जीवन को ऊर्जावान बनाते है. गुरु जीवन को सार्थक है. गुरू वह हैं जो शिष्य को अक्षर से अक्षय तक की यात्रा कराते हैं. गुरू ही तो प्रभु से मिलाते हैं और प्रभु तक की यात्रा में कुशल मार्गदर्शक होते हैं. शिष्य के लिए सर्वोच्च उपकारी होते हैं जिन गुरू दिगम्बर गुरू दुनिया की सर्व श्रेष्ठ शक्ति है. मुनि श्री ने परम पूज्य गणाचार्य गुरूदेव विराग सागर जी मुनिराज का भक्तिमय गुणानुवाद किया. पश्चात वर्षायोग कलश, साधना कलश, रत्नत्रय कलश, ज्ञानकलश, विरागोदय कलश रूप पंच चातुर्मास मंगल कलश की स्थापना की गई.

शुभारंभ मैं ध्वजारोहण, चित्र अनावरण गुरूदेव का, दीप प्रज्वलन, श्रीफल भेंट, पाद प्रक्षालन, शास्त्र भेंट, बाल ब्रं अलका दीदी एवं भारती दीदी द्वारा मंगल गीत, गुरुदेव की पूजन सम्पन्न की गई.

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